ज्ञान का आलोक


Priya Chaturvedi
Global Markets Professional, avid reader, finding rhythm in semi-classical dance and expression in Hindi verse.
The poem beautifully celebrates the teacher as a potter, navigator, healer, and benefactor who shapes lives, dispels ignorance, nurtures humanity, and illuminates the path with wisdom, knowledge, compassion, and selfless guidance.
शिक्षक ही वह कुम्भकार
जो मृद भांडों में जीवन डाले,
बाहर से कर चोट लगाकर भीतर
मृद घट को सुघड़ रूप में ढाले,
मेरे जीवन के घट का सुंदर आकार वही।
शिक्षक ही वह नाविक है
जो भव सागर को पार कराये,
अनुभव से अनभिज्ञ नाव को
नित लहरों का भाव बताये,
फंसी हुई जीवन तरणी को तट का आह्वान वही।
शिक्षक ही वह निपुण वैद्य
जो जड़ता का उपचार करे,
कर शब्दों से मन की शल्य चिकित्सा
मानवता पर उपकार करे,
अज्ञानता की व्याधि को संजीवनी वही।
शिक्षक वह निर्धन कुबेर है
जिसके पास ज्ञान की अलका,
मरुथल में जल का आभास सभी
स्रोत वही निर्मल जल का,
जड़ जीवन में चेतन का अक्षय कोष वही।
शिक्षक ही वह दानवीर जो
सहज ज्ञान का दान करे,
विद्या का धन देकर भी
मन में न कभी अभिमान करे,
अज्ञानता से पूर्ण पथ में ज्ञान का आलोक वही।


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