निराशा - आशा
- Priya Chaturvedi

- Apr 11
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Priya Chaturvedi
Global Markets Professional, avid reader, finding rhythm in semi-classical dance and expression in Hindi verse.
निराशा
फूटी गागर को देख देख
यदि लोचन भर आते हैं,
भ्रमरों के गुंजन भी यदि
मन की व्यथा बढ़ाते हैं,
देख देख यदि नील गगन को
स्मृतियाँ फिर जीवन पा जाती हैं,
रागों की यदि स्वरमालाएँ
क्रन्दन बनकर छा जाती हैं,
हे मानव! यदि जीवन में
इतनी ही घोर निराशा है,
तब तो फिर यह जग जीवन भी
एक झूठी सी अभिलाषा है।
आशा
माटी की मटकी छार हुई
पर पनघट क्लांत नहीं होते,
फूलों के झरने से भँवरे
अमृत की आस नहीं खोते,
गगन साँझ की स्मृति नहीं केवल
धरा को उषा का सपन है,
राग नहीं विरह में ललित केवल
प्रेम में तिरता यमन है,
थके हुए पाँवों से पंथी
डगमग चलना ही अभिलाषा है,
हे मानव! है चिंताओं से भरा किंतु
जीवन का होना खुद में आशा है।

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