प्रगति का खेल


Sandeep Mishra
Electrical Engineer,
Gold Medalist,
Senior Executive,
Poet, Tabla Enthusiast.
प्रगति का खेल
प्रगति का ये खेल कैसा अनोखा है
सूरज जो क्षितिज से ऊगता था
आज उसे बिल्डिंगों के पीछे से निकलते देखा है।
कट रहे हैं जंगल , उजड़ रही हैं बगिया
आज बरगद के पेड़ को
एक गमले में बोनजाइ बने देखा है।
संबंधों पर भी कैसे लग गये हैं जाले
लोग अब आपस में मिलते नहीं
उन्हें सोशल मीडिया पर चैट करते देखा है।
सूने हो रहे हैं गांव और छोटे शहर
आज के नौजवानों को हमने
महानगरों में बसते देखा है।
बिखर रहे परिवार और टूट रहे हैं संबध
हमने अक्सर बूढ़े मां-बाप को
बच्चों के लिए तरसते देखा है।
धर्म भी हो गया है अब दिखावे का
लोग घर में नहीं करते हैं पूजा
लेकिन मंदिरों में कतारों में खड़े देखा है
प्रगति का यह खेल कैसा अनोखा है।
संदीप मिश्रा


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