होली की यादें
- Sandeep Mishra

- 20 hours ago
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Sandeep Mishra
Electrical engineer,
gold medalist,
senior executive,
poet, tabla enthusiast.
होली की यादें
याद आ रही है आज फिर बचपन की होली
रंग भंग संग वो मित्रों की टोली।
चंदा उगाही और लकड़ी की चोरी
सजाते थे स्टेज पर होलिका और प्रल्हाद की जोड़ी।
करते पहले पूजा फिर लगाते थे आग
बड़े बूढ़े गाते थे झूमकर फाग।
सुबह सुबह फागुन के मौसम की मस्ती
मोहल्ले की हर लड़की लगती थी अच्छी।
हाथों में गुलाल और गोरियों के गाल
रंगों की बौछार कर दिल होता बेहाल।
दोस्तों के संग करते हम हुड़दंग
मदमस्त होकर पीते थे भंग।
शाम होते होते थक जाते थे हम
रात को कवि सम्मेलन जाते मित्रो के संग।
उम्र ढलने लगी है अब नहीं रही वह उमंग
टीवी पर ही देखते होली अब हम।
पुरानी यादों में खोया था जागा सुन पत्नी की बोली
याद आ रही है आज फिर बचपन की होली।
संदीप मिश्रा।

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