बोल के लब आज़ाद हैं तेरे…
- Priya Chaturvedi

- Aug 15
- 3 min read


Priya Chaturvedi
Global Markets Professional, avid reader, finding rhythm in semi-classical dance and expression in Hindi verse.
A sharp and witty reflection on the importance of freedom of expression, urging us to think, question and speak up. Through humour and everyday examples, the article reminds us that silence is easy, but finding our voice is essential.
"बोल के लब आज़ाद हैं तेरे…"
"…बोल ज़ुबान अब तक तेरी है"। फ़ैज़ की कविता है जो बिना लाग-लपेट के हमसे अपनी बात रखने के लिए कहती है।
अभिव्यक्ति की आज़ादी केवल एक मौलिक अधिकार नहीं है, जीवन की आधारशिला है।
भगवान ने ये हुनर केवल इंसान को दिया है कि वो सोच सकता है, लेकिन मन की बात पढ़ी जा सके ऐसा शऊर, भगवान इंसान को देना भूल गए। तो ज़माने गुज़रे पर मन की बात कहना ऑटोमेट नहीं हो पाया और कहना-सुनना जारी है, यही कहने-सुनने का सिलसिला सारी खोज, विस्तार, विकास, प्रदर्शन, युद्ध, शांति, अपराध, विरोध आदि का कारक है।
इसीलिए ये कहना गलत नहीं है कि धरती शेषनाग के फन पर नहीं बल्कि अभिव्यक्ति की आज़ादी पर टिकी हुई है।
बोलने की आज़ादी है और कब क्या कितना बोलना चाहिए उसके कोर्स व्हाट्सएप पर उपलब्ध हैं। सब सोचते हैं कि अपनी अभिव्यक्ति व्हाट्सएप पर कर लें, ऐसी बरसात में सड़क पर कौन जाए। मन की तसल्ली के लिए लोग अब डिजिटली अपनी अभिव्यक्ति करते हैं, जो काफी हद तक विचारों से अधिक “रिमेनिंग बैटरी %” पर निर्भर करती है।
हम या आप कोई भी हो, अभिव्यक्ति अपने लिए चाहता है अपने प्रति नहीं। जो बात हम कहें वो आलोचना है लेकिन कोई और कहे तो मानहानि है। मुझे तो लगता है मानहानि शब्द का तो ईजाद ही इसलिए किया गया ताकि अभिव्यक्ति की आज़ादी को टक्कर दी जा सके।
और सच मानिए टक्कर ज़ोरदार है। अभिव्यक्ति और मानहानि महाभारत के तीरों की तरह एक दूसरे को काट देते हैं।
अच्छा, अभिव्यक्ति का समय भी बड़ी ज़रूरी चीज़ है। अब नेताओं का ही किस्सा लीजिए, “गरीब मज़दूर के पेट की आग, जो उनकी रैली के भाषणों में सुलगती है, सदन के एसी उसे मानो बुझा ही देते हैं”।
वैसे नेताओं को छोड़िए, वो वैसे भी मानसून सत्र में अपना हल्ला-गुल्ला कर रहे हैं, उनके हंगामा को अभिव्यक्ति जैसी छोटी बातों के लिए स्थगित नहीं करना चाहिए।
हम अपनी बात करते हैं, अपने दफ़्तर में ना बोल पाने वाली जनता सोचती है कि जो लोग अन्याय का शिकार हैं, अपनी आवाज़ क्यों नहीं उठाते। उन्हें मालूम भी तो होना चाहिए कि आवाज़ उठानी है।
कोई अंत्योदय की आस लगाए बैठा हो तो सूरज को जल ही देता है, उसके विस्तार पर प्रश्न नहीं उठाता। खैर नहीं मालूम होने का भी बहुत हर्ज़ाना नहीं है क्योंकि जिन्होंने आवाज़ उठाई उन्हें कौनसा वैकुंठ मिल गया है, यहीं कोर्ट में भटकते फिरते हैं अपनी अभिव्यक्ति की फाइल लिए।
लेकिन सुनिए, कहना ज़रूरी है। कहिए कि आप हर बच्चे की आँखों में रंग देखना चाहते हैं, कहिए कि पीपीटी को किताबों की जगह लेने का कोई हक़ नहीं है, कहिए कि अभिव्यक्ति बस ट्विटर का ट्रेंड या इंस्टाग्राम की रील नहीं है, कहिए क्योंकि चुप रहकर देखना भी सहमति है।
किसी को अगर ये मुगालता है कि अभिव्यक्ति को बांधा जा सकता है तो वह इसलिए है कि हम अपनी आज़ादी का इस्तेमाल सही ढंग से नहीं कर सके हैं।
सोचिए, कहिए, पूछिए क्योंकि आपको अभिव्यक्ति का अधिकार है,
खैर मेरा काम था, कि आज़ादी का पर्व आ रहा है आपको याद दिला दूं, "बोल कि लब आज़ाद हैं तेरे, बोल ज़ुबान अब तक तेरी है, बोल के सच जिंदा है अब तक, बोल जो कुछ कहना है कह ले”

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